अन्वयः
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हे प्रिय, उत्थितः सन् मनोहरम् वपुः पुनः प्रतिपद्य, तावत् मधुर-आलाप-निसर्ग-पण्डिताम् कोकिलाम् रति-दूति-पदेषु अपि आदिश।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
प्रतिपद्येति । तावत्पुनरपि मनोहरं वपुः शरीरं प्रतिपद्य प्राप्योत्थितः सन् । मधुरालापेषु प्रियोक्तिषु निसर्गपण्डितां स्वभावप्रगल्भां कोकिलां रतिदूतिपदेषु । सुरतदूतीस्थानेष्वादिशाज्ञापय । प्रगल्भानामेव दौत्याधिकार इति भावः । ङीबन्तस्यापि दूतीशब्दस्य छन्दोभङ्गभयाद्ध्रस्वः । `अपि माषं मषं कुर्याच्छन्दोभङ्गे त्यजेद्गिरम्` इति केचित् । `उणादयो बहुलम्` (अष्टाध्यायी ३.३.१ ) इति बहुलग्रहणाद्घ्रस्व इति वल्लभः
Summary
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"Rise up, and having regained your enchanting form, please command again the cuckoo, naturally skilled in sweet warbling, to her duties as a love-messenger."
सारांश
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हे प्रिय! पुनः सुंदर शरीर धारण कर उठो और मधुर वाणी में निपुण इस कोयल को रति की दूती के कार्य में नियुक्त करने की आज्ञा प्रदान करो।
पदच्छेदः
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| प्रतिपद्य | प्रतिपद्य (प्रति√पद्+ल्यप्) | having regained |
| मनोहरम् | मनोहर (२.१) | enchanting |
| वपुः | वपुस् (२.१) | form |
| पुनः | पुनर् | again |
| अपि | अपि | also |
| आदिश | आदिश (आ√दिश् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | command |
| तावत् | तावत् | then |
| उत्थितः | उत्थित (उद्√स्था+क्त, १.१) | having risen up |
| रतिदूतिपदेषु | रति–दूति–पद (७.३) | to the duties of a love-messenger |
| कोकिलाम् | कोकिला (२.१) | the cuckoo |
| मधुरालापनिसर्गपण्डिताम् | मधुर–आलाप–निसर्ग–पण्डित (२.१) | naturally skilled in sweet warbling |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | ति | प | द्य | म | नो | ह | रं | व | पुः | |
| पु | न | र | प्या | दि | श | ता | व | दु | त्थि | तः |
| र | ति | दू | ति | प | दे | षु | को | कि | लां | |
| म | धु | रा | ला | प | नि | स | र्ग | प | ण्डि | ताम् |
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