अन्वयः
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त्वया अनेकशः धनुषः गुण-कृत्ये नियोजिता इयम् अलि-पङ्क्तिः करुण-स्वनैः विरुतैः गुरु-शोकाम् माम् अनु-रोदिति इव।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अलीति । त्वयानेकशो बहुशो धनुषः कार्मुकस्य गुणकृत्ये मौर्वीकार्ये गुणवत्कर्मणि च नियोजिताधिकृतेयमलिपङ्क्तिः करुणस्वनेर्दीनस्वनर्विरुतैः कूजितैर्गुरुशोकां दुर्भरदुःखाम् । `गुरुस्तु गोष्पतौ श्रेष्ठे गुरौ पितरि दुर्भरे` । इति शब्दार्णवः । मामनुरोदितीव उपसर्गात्सकर्मकत्वम् । `रुदादिभ्यः सार्वधातुके` (अष्टाध्यायी ७.२.७६ ) इतीडागमः
Summary
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"This line of bees, which you often employed to serve as your bowstring, now seems to be weeping along with me, who am heavy with grief, with its piteous-sounding hums."
सारांश
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तुम्हारे धनुष की प्रत्यंचा बनने वाले ये भौंरे अपने गुंजन के बहाने अब मेरे साथ मिलकर मानो तुम्हारे शोक में करुण विलाप कर रहे हैं।
पदच्छेदः
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| अलिपङ्क्तिः | अलि–पङ्क्ति (१.१) | this line of bees |
| अनेकषः | अनेकषस् | often |
| त्वया | युष्मद् (३.१) | by you |
| गुणकृत्ये | गुण–कृत्य (७.१) | in the function of a bowstring |
| धनुषः | धनुस् (६.१) | of the bow |
| नियोजिता | नियोजित (नि√युज्+णिच्+क्त, १.१) | was employed |
| विरुतैः | विरुत (३.३) | with its hums |
| करुणस्वनैः | करुण–स्वन (३.३) | piteous-sounding |
| इयम् | इदम् (१.१) | this |
| गुरुशोकाम् | गुरु–शोक (२.१) | heavy with grief |
| अनुरोदिति | अनुरोदिति (अनु√रुद् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | weeps along with |
| इव | इव | as if |
| माम् | अस्मद् (२.१) | me |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | लि | प | ङ्क्ति | र | ने | क | श | स्त्व | या | |
| गु | ण | कृ | त्ये | ध | नु | षो | नि | यो | जि | ता |
| वि | रु | तैः | क | रु | ण | स्व | नै | रि | यं | |
| गु | रु | शो | का | म | नु | रो | दि | ती | व | माम् |
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