अन्वयः
AI
पार्थ, अभ्यासयोगयुक्तेन नान्यगामिना चेतसा अनुचिन्तयन् (योगी) परमम् दिव्यम् पुरुषम् याति।
Summary
AI
O Partha, he who meditates on the Supreme Divine Person with a mind made steady by the practice of yoga, never straying, reaches Him.
सारांश
AI
हे पार्थ! अभ्यास योग से युक्त और अन्यत्र न भटकने वाले चित्त से दिव्य परम पुरुष का निरंतर चिंतन करने वाला मनुष्य उन्हीं को प्राप्त होता है।
पदच्छेदः
AI
| अभ्यासयोगयुक्तेन | अभ्यास–योग–युक्त (३.१) | by being engaged in the yoga of practice |
| चेतसा | चेतस् (३.१) | with a mind |
| नान्यगामिना | न–अन्य–गामिन् (३.१) | not straying to anything else |
| परमम् | परम (२.१) | the supreme |
| पुरुषम् | पुरुष (२.१) | Person |
| दिव्यम् | दिव्य (२.१) | divine |
| याति | याति (√या कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | one reaches |
| पार्थ | पार्थ (८.१) | O Partha |
| अनुचिन्तयन् | अनुचिन्तयत् (अनु√चिन्त्+शतृ, १.१) | meditating |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | भ्या | स | यो | ग | यु | क्ते | न |
| चे | त | सा | ना | न्य | गा | मि | ना |
| प | र | मं | पु | रु | षं | दि | व्यं |
| या | ति | पा | र्था | नु | चि | न्त | यन् |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.