बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥

अन्वयः AI बाह्यस्पर्शेषु असक्तात्मा (यः) आत्मनि यत् सुखम् विन्दति, सः ब्रह्मयोगयुक्तात्मा अक्षयम् सुखम् अश्नुते ।
Summary AI One whose self is unattached to external contacts finds happiness within the Self. With the self engaged in the meditation of Brahman, he enjoys unending bliss.
सारांश AI बाहरी विषयों में आसक्ति न रखने वाला व्यक्ति अपनी आत्मा में जिस सुख को पाता है, वह ब्रह्मयोग में लीन होकर अक्षय आनंद का अनुभव करता है।
पदच्छेदः AI
बाह्यस्पर्शेषुबाह्यस्पर्श (७.३) to external contacts
असक्तात्माअसक्त (√सञ्ज्+क्त)आत्मन् (१.१) one whose self is unattached
विन्दतिविन्दति (√विद् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) finds
आत्मनिआत्मन् (७.१) in the Self
यत्यद् (२.१) that which
सुखम्सुख (२.१) is happiness
सःतद् (१.१) he
ब्रह्मयोगयुक्तात्माब्रह्मन्योगयुक्त (√युज्+क्त)आत्मन् (१.१) with the self united in Brahman through yoga
सुखम्सुख (२.१) happiness
अक्षयम्अक्षय (२.१) imperishable
अश्नुतेअश्नुते (√अश् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) enjoys
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
बा ह्य स्प र्शे ष्व क्ता त्मा
वि न्द त्या त्म नि त्सु खम्
ब्र ह्म यो यु क्ता त्मा
सु क्ष श्नु ते
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