न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥
स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥
अन्वयः
AI
स्थिरबुद्धिः, असंमूढः, ब्रह्मवित्, ब्रह्मणि स्थितः (नरः) प्रियम् प्राप्य न प्रहृष्येत्, अप्रियम् प्राप्य च न उद्विजेत् ।
Summary
AI
One with a steady intellect, undeluded, who knows Brahman and is established in it, should neither rejoice upon attaining the pleasant nor grieve upon attaining the unpleasant.
सारांश
AI
जो प्रिय को प्राप्त कर हर्षित न हो और अप्रिय को पाकर उद्विग्न न हो, वह स्थिर बुद्धि और मोह रहित ब्रह्मवेत्ता पुरुष ब्रह्म में ही स्थित है।
पदच्छेदः
AI
| न | न | should not |
| प्रहृष्येत् | प्रहृष्येत् (प्र√हृष् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | rejoice |
| प्रियम् | प्रिय (२.१) | the pleasant |
| प्राप्य | प्राप्य (प्र√आप्+ल्यप्) | on obtaining |
| न | न | should not |
| उद्विजेत् | उद्विजेत् (उद्√विज् कर्तरि विधिलिङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | be agitated |
| प्राप्य | प्राप्य (प्र√आप्+ल्यप्) | on obtaining |
| च | च | and |
| अप्रियम् | अप्रिय (२.१) | the unpleasant |
| स्थिरबुद्धिः | स्थिर–बुद्धि (१.१) | One with a steady intellect |
| असंमूढः | असंमूढ (१.१) | undeluded |
| ब्रह्मवित् | ब्रह्मन्–विद् (१.१) | a knower of Brahman |
| ब्रह्मणि | ब्रह्मन् (७.१) | in Brahman |
| स्थितः | स्थित (√स्था+क्त, १.१) | established |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | प्र | हृ | ष्ये | त्प्रि | यं | प्रा | प्य |
| नो | द्वि | जे | त्प्रा | प्य | चा | प्रि | यम् |
| स्थि | र | बु | द्धि | र | सं | मू | ढो |
| ब्र | ह्म | वि | द्ब्र | ह्म | णि | स्थि | तः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.