न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या
द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥

अन्वयः AI हि यत् मम इन्द्रियाणाम् उच्छोषणम् शोकम् अपनुद्यात्, (तत्) न प्रपश्यामि, भूमौ असपत्नम् ऋद्धम् राज्यम् सुराणाम् च अपि आधिपत्यम् अवाप्य (अपि)।
Summary AI I do not see what could remove this grief that is withering my senses, even if I were to win an unrivaled and prosperous kingdom on earth or sovereignty over the gods.
सारांश AI इंद्रियों को सुखाने वाले इस शोक को दूर करने वाला कोई उपाय मुझे नहीं दिखता, भले ही मैं पृथ्वी पर निष्कंटक समृद्ध राज्य और देवताओं का स्वामित्व भी प्राप्त कर लूँ।
पदच्छेदः AI
not
हिहि for
प्रपश्यामिप्रपश्यामि (प्र√दृश् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) I see
ममअस्मद् (६.१) my
अपनुद्यात्अपनुद्यात् (अप√नुद् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) would remove
यत्यद् (१.१) that which
शोकम्शोक (२.१) grief
उच्छोषणम्उच्छोषण (उत्√शुष्+ल्युट्, २.१) which is drying up
इन्द्रियाणाम्इन्द्रिय (६.३) of the senses
अवाप्यअवाप्य (अव√आप्+ल्यप्) having obtained
भूमौभूमि (७.१) on earth
असपत्नम्नञ्सपत्न (२.१) unrivaled
ऋद्धम्ऋद्ध (√ऋध्+क्त, २.१) prosperous
राज्यम्राज्य (२.१) kingdom
सुराणाम्सुर (६.३) of the gods
अपिअपि even
and
आधिपत्यम्आधिपत्य (२.१) sovereignty
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
हि प्र श्या मि मा नु द्या
द्य च्छो मु च्छो मि न्द्रि या णाम्
वा प्य भू मा त्न मृ द्धं
रा ज्यं सु रा णा पि चा धि त्यम्
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