अन्वयः
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निराहारस्य देहिनः विषयाः रसवर्जम् विनिवर्तन्ते । अस्य रसः अपि परम् दृष्ट्वा निवर्तते ।
Summary
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For an embodied being who practices abstinence, the objects of the senses turn away, but the craving for them remains. However, upon seeing the Supreme, even this craving ceases for him.
सारांश
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विषयों का भोग न करने वाले मनुष्य के विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परंतु उनमें रहने वाली आसक्ति बनी रहती है; वह आसक्ति भी परमात्मा के दर्शन से शांत हो जाती है।
पदच्छेदः
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| विषयाः | विषय (१.३) | The objects of the senses |
| विनिवर्तन्ते | विनिवर्तन्ते (वि+नि√वृत् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | turn away |
| निराहारस्य | निर्–आहार (६.१) | from the abstinent |
| देहिनः | देहिन् (६.१) | embodied being |
| रसवर्जम् | रस–वर्जम् (√वृज्+ण्यत्) | leaving the craving behind |
| रसः | रस (१.१) | the craving |
| अपि | अपि | even |
| अस्य | इदम् (६.१) | his |
| परम् | पर (२.१) | the Supreme |
| दृष्ट्वा | दृष्ट्वा (√दृश्+क्त्वा) | having seen |
| निवर्तते | निवर्तते (नि√वृत् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | ceases |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | ष | या | वि | नि | व | र्त | न्ते |
| नि | रा | हा | र | स्य | दे | हि | नः |
| र | स | व | र्जं | र | सो | ऽप्य | स्य |
| प | रं | दृ | ष्ट्वा | नि | व | र्त | ते |
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