अन्वयः
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यदा ते बुद्धिः मोहकलिलम् व्यतितरिष्यति, तदा त्वम् श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च निर्वेदम् गन्तासि।
Summary
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When your intellect crosses beyond the dense forest of delusion, you will become indifferent to all that has been heard and all that is yet to be heard.
सारांश
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जब तुम्हारी बुद्धि मोह रूपी दलदल को पार कर जाएगी, तब तुम सुनने योग्य और पूर्व में सुने गए सभी विषयों के प्रति वैराग्य को प्राप्त हो जाओगे।
पदच्छेदः
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| यदा | यदा | when |
| ते | युष्मद् (६.१) | your |
| मोहकलिलम् | मोहकलिल (२.१) | the dense forest of delusion |
| बुद्धिः | बुद्धि (१.१) | intellect |
| व्यतितरिष्यति | व्यतितरिष्यति (वि+अति√तॄ कर्तरि लृट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | will cross beyond |
| तदा | तदा | then |
| गन्तासि | गन्तासि (√गम् कर्तरि लुट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you will attain |
| निर्वेदम् | निर्वेद (२.१) | indifference |
| श्रोतव्यस्य | श्रोतव्य (√श्रु+तव्यत्, ६.१) | to what is to be heard |
| श्रुतस्य | श्रुत (√श्रु+क्त, ६.१) | to what has been heard |
| च | च | and |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | दा | ते | मो | ह | क | लि | लं |
| बु | द्धि | र्व्य | ति | त | रि | ष्य | ति |
| त | दा | ग | न्ता | सि | नि | र्वे | दं |
| श्रो | त | व्य | स्य | श्रु | त | स्य | च |
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