गुरूनहत्वा हि महानुभावा
ञ्श्रेयो भोक्तुं भैक्षमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुञ्जीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान् ॥
गुरूनहत्वा हि महानुभावा
ञ्श्रेयो भोक्तुं भैक्षमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुञ्जीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान् ॥
ञ्श्रेयो भोक्तुं भैक्षमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुञ्जीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान् ॥
अन्वयः
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महानुभावान् गुरून् अहत्वा इह लोके भैक्षम् अपि भोक्तुम् श्रेयः हि। तु अर्थकामान् गुरून् हत्वा इह एव रुधिरप्रदिग्धान् भोगान् भुञ्जीय।
Summary
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It is better to live in this world by begging than to kill these great-souled teachers. But if I kill them, though they are seeking worldly gain, any pleasures I enjoy here will be stained with their blood.
सारांश
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महानुभाव गुरुजनों को मारने की अपेक्षा इस लोक में भिक्षा का अन्न खाना अधिक श्रेयस्कर है। उन्हें मारकर मैं इसी संसार में रक्त से सने हुए धन और कामरूपी भोगों को ही भोगूँगा।
पदच्छेदः
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| गुरून् | गुरु (२.३) | teachers |
| अहत्वा | अहत्वा (√हन्+नञ्+क्त्वा) | without killing |
| हि | हि | indeed |
| महानुभावान् | महा–अनुभाव (२.३) | the magnanimous |
| श्रेयः | श्रेयस् (१.१) | it is better |
| भोक्तुम् | भोक्तुम् (√भुज्+तुमुन्) | to eat |
| भैक्षम् | भैक्ष (२.१) | alms |
| अपि | अपि | even |
| इह | इह | here |
| लोके | लोक (७.१) | in this world |
| हत्वा | हत्वा (√हन्+क्त्वा) | having killed |
| अर्थकामान् | अर्थ–काम (२.३) | desirous of wealth |
| तु | तु | but |
| गुरून् | गुरु (२.३) | the teachers |
| इह | इह | here |
| एव | एव | itself |
| भुञ्जीय | भुञ्जीय (√भुज् कर्तरि विधिलिङ् (आत्मने.) उ.पु. एक.) | I would enjoy |
| भोगान् | भोग (२.३) | pleasures |
| रुधिरप्रदिग्धान् | रुधिर–प्रदिग्ध (प्र√दिह्+क्त, २.३) | smeared with blood |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| गु | रू | न | ह | त्वा | हि | म | हा | नु | भा | वा |
| ञ्श्रे | यो | भो | क्तुं | भै | क्ष | म | पी | ह | लो | के |
| ह | त्वा | र्थ | का | मां | स्तु | गु | रू | नि | है | व |
| भु | ञ्जी | य | भो | गा | न्रु | धि | र | प्र | दि | ग्धान् |
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