वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा
न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥

अन्वयः AI यथा नरः जीर्णानि वासांसि विहाय अपराणि नवानि (वासांसि) गृह्णाति, तथा देही जीर्णानि शरीराणि विहाय अन्यानि नवानि (शरीराणि) संयाति।
Summary AI As a person puts on new garments, giving up old ones, the soul similarly accepts new material bodies, giving up the old and useless ones.
सारांश AI जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को छोड़कर अन्य नए शरीरों में प्रवेश करती है।
पदच्छेदः AI
वासांसिवासस् (२.३) garments
जीर्णानिजीर्ण (√जॄ+क्त, २.३) worn-out
यथायथा as
विहायविहाय (वि√हा+ल्यप्) giving up
नवानिनव (२.३) new
गृह्णातिगृह्णाति (√ग्रह् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) takes
नरःनर (१.१) a person
अपराणिअपर (२.३) other
तथातथा so
शरीराणिशरीर (२.३) bodies
विहायविहाय (वि√हा+ल्यप्) giving up
जीर्णानिजीर्ण (√जॄ+क्त, २.३) worn-out
अन्यानिअन्य (२.३) other
संयातिसंयाति (सम्√या कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) accepts
नवानिनव (२.३) new
देहीदेहिन् (१.१) the embodied soul
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
वा सां सि जी र्णा नि था वि हा
वा नि गृ ह्णा ति रो ऽप रा णि
था री रा णि वि हा जी र्णा
न्य न्या नि सं या ति वा नि दे ही
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