चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥

अन्वयः AI चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य, मत्परः (सन्), बुद्धियोगम् उपाश्रित्य, सततम् मच्चित्तः भव।
Summary AI Mentally renouncing all actions unto Me, regarding Me as the supreme goal, and taking refuge in the yoga of intellect, always fix your mind on Me.
सारांश AI चित्त से सब कर्मों को मुझमें अर्पण कर, मेरे परायण होकर और बुद्धियोग का आश्रय लेकर निरंतर मुझमें चित्त वाला हो।
पदच्छेदः AI
चेतसाचेतस् (३.१) With the mind
सर्वकर्माणिसर्वकर्मन् (२.३) all actions
मयिअस्मद् (७.१) in Me
संन्यस्यसंन्यस्य (सम्+नि√अस्+ल्यप्) having renounced
मत्परःअस्मद्पर (१.१) regarding Me as the supreme goal
बुद्धियोगम्बुद्धियोग (२.१) the yoga of intellect
उपाश्रित्यउपाश्रित्य (उप+आ√श्रि+ल्यप्) having taken refuge in
मच्चित्तःअस्मद्चित्त (१.१) with mind fixed on Me
सततम्सततम् always
भवभव (√भू कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) be
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
चे सा र्व र्मा णि
यि सं न्य स्य त्प रः
बु द्धि यो मु पा श्रि त्य
च्चि त्तः तं
About

Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.