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स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥

अन्वयः AI स्वे स्वे कर्मणि अभिरतः नरः संसिद्धिम् लभते । स्वकर्मनिरतः (नरः) यथा सिद्धिम् विन्दति, तत् शृणु ।
Summary AI A person devoted to their own respective duty attains perfection. Listen to how one who is engaged in their own duty finds that perfection.
सारांश AI अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्पर मनुष्य परम सिद्धि प्राप्त करता है। स्वकर्म में लगा व्यक्ति जिस प्रकार सिद्धि पाता है, उसे सुनो।
पदच्छेदः AI
स्वेस्व (७.१) in his own
स्वेस्व (७.१) respective
कर्मणिकर्मन् (७.१) duty
अभिरतःअभिरत (अभि√रम्+क्त, १.१) devoted
संसिद्धिम्संसिद्धि (२.१) perfection
लभतेलभते (√लभ् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) attains
नरःनर (१.१) a person
स्वकर्मनिरतःस्वकर्मन्निरत (नि√रम्+क्त, १.१) One engaged in his own duty
सिद्धिम्सिद्धि (२.१) perfection
यथायथा how
विन्दतिविन्दति (√विद् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) finds
तत्तद् (२.१) that
शृणुशृणु (√श्रु कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) listen
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
स्वे स्वे र्म ण्य भि तः
सं सि द्धिं ते रः
स्व र्म नि तः सि द्धिं
था वि न्द ति च्छृ णु
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