अन्वयः
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यत् तु कर्म कामेप्सुना वा पुनः साहंकारेण बहुलायासम् क्रियते, तत् राजसम् उदाहृतम् ।
Summary
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But that action which is performed with great effort by one who seeks to gratify desires, or with egoism, is declared to be rajasic.
सारांश
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जो कर्म फल की इच्छा रखने वाले या अहंकारयुक्त पुरुष द्वारा बहुत परिश्रम के साथ किया जाता है, वह राजस कहा गया है।
पदच्छेदः
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| यत् | यद् (१.१) | That |
| तु | तु | but |
| कामेप्सुना | काम–ईप्सु (३.१) | by one desiring fruits |
| कर्म | कर्मन् (१.१) | action |
| साहंकारेण | सह–अहंकार (३.१) | with egoism |
| वा | वा | or |
| पुनः | पुनर् | again |
| क्रियते | क्रियते (√कृ भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is performed |
| बहुलायासम् | बहुलायास (२.१) | with much effort |
| तत् | तद् (१.१) | that |
| राजसम् | राजस (१.१) | rajasic |
| उदाहृतम् | उदाहृत (उद्+आ√हृ+क्त, १.१) | is declared to be |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | त्तु | का | मे | प्सु | ना | क | र्म |
| सा | हं | का | रे | ण | वा | पु | नः |
| क्रि | य | ते | ब | हु | ला | या | सं |
| त | द्रा | ज | स | मु | दा | हृ | तम् |
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