यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥

अन्वयः AI तु यत् (दानम्) प्रत्युपकारार्थम् वा पुनः फलम् उद्दिश्य च परिक्लिष्टम् दीयते, तत् दानम् राजसम् स्मृतम् ।
Summary AI But the gift which is given grudgingly, for the sake of a return favor or with an eye on the fruit, is considered Rajasic.
सारांश AI जो दान बदले में उपकार पाने की इच्छा से, फल की प्राप्ति के उद्देश्य से या खिन्न मन से दिया जाता है, उसे राजस दान कहा जाता है।
पदच्छेदः AI
यत्यद् (१.१) which (gift)
तुतु but
प्रत्युपकारार्थम्प्रति-उपकारअर्थम् for the sake of a return favor
फलम्फल (२.१) a result
उद्दिश्यउद्दिश्य (उद्√दिश्+ल्यप्) aiming at
वावा or
पुनःपुनर् again
दीयतेदीयते (√दा भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) is given
and
परिक्लिष्टम्परिक्लिष्ट (परि√क्लिश्+क्त, १.१) grudgingly
तत्तद् (१.१) that
दानम्दान (१.१) gift
राजसम्राजस (१.१) as Rajasic
स्मृतम्स्मृत (√स्मृ+क्त, १.१) is considered
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
त्तु प्र त्यु का रा र्थं
मु द्दि श्य वा पु नः
दी ते रि क्लि ष्टं
द्दा नं रा सं स्मृ तम्
About

Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.