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शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥

अन्वयः AI ईश्वरः यत् शरीरम् अवाप्नोति, यत् च अपि (शरीरात्) उत्क्रामति, (तदा) एतानि गृहीत्वा संयाति, वायुः आशयात् गन्धान् इव।
Summary AI When the lord (the soul) acquires a body and when it departs from it, it takes these (senses and mind) and goes with them, just as the wind carries scents from their sources.
सारांश AI जैसे वायु गंध के स्थान से सुगंध को साथ ले जाती है, वैसे ही शरीर का स्वामी जीवात्मा एक शरीर त्यागते समय मन और इंद्रियों को साथ लेकर दूसरे शरीर में प्रवेश करता है।
पदच्छेदः AI
शरीरम्शरीर (२.१) a body
यत्यद् when
अवाप्नोतिअवाप्नोति (अव√आप् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) obtains
यत्यद् when
and
अपिअपि also
उत्क्रामतिउत्क्रामति (उद्√क्रम् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) departs
ईश्वरःईश्वर (१.१) the Lord (the soul)
गृहीत्वागृहीत्वा (√ग्रह्+क्त्वा) having taken
एतानिएतद् (२.३) these
संयातिसंयाति (सम्√या कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) goes forth
वायुःवायु (१.१) the wind
गन्धान्गन्ध (२.३) scents
इवइव like
आशयात्आशय (५.१) from their source
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
री रं वा प्नो ति
च्चा प्यु त्क्रा ती श्व रः
गृ ही त्वै ता नि सं या ति
वा यु र्ग न्धा नि वा यात्
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