अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा
गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसंततानि
कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा
गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसंततानि
कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥
गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसंततानि
कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥
अन्वयः
AI
तस्य गुणप्रवृद्धाः विषयप्रवालाः शाखाः अधः च ऊर्ध्वम् च प्रसृताः (सन्ति)। कर्मानुबन्धीनि मूलानि अधः च मनुष्यलोके अनुसंततानि (सन्ति)।
Summary
AI
Its branches, nourished by the gunas and having sense-objects as their new shoots, extend downwards and upwards. Its roots, which bind to action, also stretch downwards into the human world.
सारांश
AI
इस वृक्ष की शाखाएँ गुणों द्वारा पोषित होकर ऊपर-नीचे फैली हैं और विषय-भोग इसकी कोपलें हैं; इसकी जड़ें नीचे मनुष्य लोक में भी फैली हुई हैं, जो कर्मों के बंधन में बांधती हैं।
पदच्छेदः
AI
| अधः | अधस् | downwards |
| च | च | and |
| ऊर्ध्वम् | ऊर्ध्वम् | upwards |
| प्रसृताः | प्रसृत (प्र√सृ+क्त, १.३) | are spread |
| तस्य | तद् (६.१) | its |
| शाखाः | शाखा (१.३) | branches |
| गुणप्रवृद्धाः | गुण–प्रवृद्ध (प्र√वृध्+क्त, १.३) | nourished by the gunas |
| विषयप्रवालाः | विषय–प्रवाल (१.३) | with sense-objects as their sprouts |
| अधः | अधस् | downwards |
| च | च | and |
| मूलानि | मूल (१.३) | the roots |
| अनुसंततानि | अनुसंतत (अनु+सम्√तन्+क्त, १.३) | are stretched forth |
| कर्मानुबन्धीनि | कर्म–अनुबन्धिन् (१.३) | which result in actions |
| मनुष्यलोके | मनुष्य–लोक (७.१) | in the world of humans |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | ध | श्चो | र्ध्वं | प्र | सृ | ता | स्त | स्य | शा | खा |
| गु | ण | प्र | वृ | द्धा | वि | ष | य | प्र | वा | लाः |
| अ | ध | श्च | मू | ला | न्य | नु | सं | त | ता | नि |
| क | र्मा | नु | ब | न्धी | नि | म | नु | ष्य | लो | के |
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.