उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥

अन्वयः AI उत्क्रामन्तम् वा स्थितम् वा अपि गुणान्वितम् भुञ्जानम् वा (एनम्) विमूढाः न अनुपश्यन्ति। ज्ञानचक्षुषः (तु) पश्यन्ति।
Summary AI The deluded do not perceive the soul as it departs, stays, or enjoys, united with the gunas. But those with the eye of knowledge see it.
सारांश AI शरीर त्यागते हुए, शरीर में स्थित रहते हुए या गुणों के संग विषयों को भोगते हुए जीवात्मा को अज्ञानी नहीं देख पाते, केवल ज्ञान रूपी नेत्रों वाले विवेकशील ही उसे देख पाते हैं।
पदच्छेदः AI
उत्क्रामन्तम्उत्क्रामत् (उद्√क्रम्+शतृ, २.१) the one who is departing
स्थितम्स्थित (√स्था+क्त, २.१) abiding
वावा or
अपिअपि also
भुञ्जानम्भुञ्जान (√भुज्+शानच्, २.१) enjoying
वावा or
गुणान्वितम्गुणअन्वित (२.१) endowed with the gunas
विमूढाःविमूढ (१.३) the deluded
do not
अनुपश्यन्तिअनुपश्यन्ति (अनु√पश् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) perceive
पश्यन्तिपश्यन्ति (√पश् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) perceive
ज्ञानचक्षुषःज्ञानचक्षुस् (१.३) those with the eye of knowledge
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
त्क्रा न्तं स्थि तं वा पि
भु ञ्जा नं वा गु णा न्वि तम्
वि मू ढा ना नु श्य न्ति
श्य न्ति ज्ञा क्षु षः
About

Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.