अन्वयः
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भरतर्षभ, यावत् किञ्चित् स्थावरजङ्गमम् सत्त्वम् सञ्जायते, तत् क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात् (सञ्जायते इति) विद्धि ।
Summary
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O best of the Bharatas, know that whatever being, moving or unmoving, comes into existence, it is from the union of the field (Kshetra) and the knower of the field (Kshetrajna).
सारांश
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हे अर्जुन! संसार में जो भी चर-अचर प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन्हें क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के संयोग से ही निर्मित समझो।
पदच्छेदः
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| यावत् | यावत् | Whatever |
| संजायते | संजायते (सम्√जन् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is born |
| किंचित् | किञ्चित् (१.१) | any |
| सत्त्वम् | सत्त्व (१.१) | being |
| स्थावरजङ्गमम् | स्थावर–जङ्गम (१.१) | moving or unmoving |
| क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात् | क्षेत्र–क्षेत्रज्ञ–संयोग (५.१) | from the union of the field and the knower of the field |
| तत् | तद् (२.१) | that |
| विद्धि | विद्धि (√विद् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | know |
| भरतर्षभ | भरतर्षभ (८.१) | O best of the Bharatas |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| या | व | त्सं | जा | य | ते | किं | चि |
| त्स | त्त्वं | स्था | व | र | ज | ङ्ग | मम् |
| क्षे | त्र | क्षे | त्र | ज्ञ | सं | यो | गा |
| त्त | द्वि | द्धि | भ | र | त | र्ष | भ |
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