अन्वयः
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धनञ्जय, अथ मयि चित्तम् स्थिरम् समाधातुम् न शक्नोषि, ततः अभ्यास-योगेन माम् आप्तुम् इच्छ।
Summary
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O Dhananjaya (Arjuna), if you are unable to fix your mind steadily on Me, then seek to attain Me through the yoga of constant practice.
सारांश
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यदि तुम मुझमें चित्त को स्थिर करने में असमर्थ हो, तो अभ्यास योग के माध्यम से मुझे प्राप्त करने का प्रयत्न करो।
पदच्छेदः
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| अथ | अथ | If, however |
| चित्तम् | चित्त (२.१) | the mind |
| समाधातुम् | समाधातुम् (सम्+आ√धा+तुमुन्) | to fix |
| न | न | not |
| शक्नोषि | शक्नोषि (√शक् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you are able |
| मयि | अस्मद् (७.१) | on Me |
| स्थिरम् | स्थिर (२.१) | steadily |
| अभ्यासयोगेन | अभ्यास–योग (३.१) | by the yoga of practice |
| ततः | ततः | then |
| माम् | अस्मद् (२.१) | Me |
| इच्छ | इच्छ (√इष् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | desire |
| आप्तुम् | आप्तुम् (√आप्+तुमुन्) | to attain |
| धनञ्जय | धनञ्जय (८.१) | O Dhananjaya |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | थ | चि | त्तं | स | मा | धा | तुं |
| न | श | क्नो | षि | म | यि | स्थि | रम् |
| अ | भ्या | स | यो | गे | न | त | तो |
| मा | मि | च्छा | प्तुं | ध | नं | ज | य |
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