अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥

अन्वयः AI यः मत्-भक्तः अनपेक्षः, शुचिः, दक्षः, उदासीनः, गत-व्यथः, सर्व-आरम्भ-परित्यागी (अस्ति), सः मे प्रियः।
Summary AI My devotee who is free from expectations, pure, skillful, unconcerned, untroubled, and who has renounced all selfish undertakings—that person is dear to Me.
सारांश AI जो इच्छा रहित, बाहर-भीतर से शुद्ध, चतुर, पक्षपात रहित और दुखों से मुक्त है, तथा जिसने सब स्वार्थपूर्ण कर्मों का त्याग किया है, वह भक्त मुझे प्रिय है।
पदच्छेदः AI
अनपेक्षःअनपेक्ष (१.१) indifferent
शुचिःशुचि (१.१) pure
दक्षःदक्ष (१.१) skillful
उदासीनःउदासीन (१.१) unconcerned
गतव्यथःगत (√गम्+क्त)व्यथा (१.१) free from anxiety
सर्वारम्भपरित्यागीसर्वआरम्भपरित्यागिन् (१.१) renouncer of all undertakings
यःयद् (१.१) who
मद्भक्तःमत्भक्त (१.१) My devotee
सःतद् (१.१) he
मेअस्मद् (६.१) to Me
प्रियःप्रिय (१.१) is dear
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
पे क्षः शु चि र्द क्ष
दा सी नो व्य थः
र्वा म्भ रि त्या गी
यो द्भ क्तः मे प्रि यः
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