अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा
भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
तदेव मे दर्शय देव रूपं
प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥

अन्वयः AI अदृष्ट-पूर्वम् दृष्ट्वा हृषितः अस्मि, च मे मनः भयेन प्रव्यथितम् (अस्ति) । देव, मे तत् रूपम् एव दर्शय । देवेश जगन्निवास, प्रसीद ।
Summary AI "I am thrilled to have seen what was never seen before, yet my mind is also greatly distressed with fear. O Lord, show me that very same form of Yours. Be gracious, O Lord of gods, O refuge of the universe."
सारांश AI आपके इस अपूर्व रूप को देखकर मैं हर्षित हूँ, किंतु मेरा मन भय से व्याकुल है। हे देवेश, हे जगन्निवास, मुझ पर प्रसन्न हों और मुझे अपना वही पूर्व रूप दिखाएँ।
पदच्छेदः AI
अदृष्टपूर्वम्अदृष्टपूर्वम् (२.१) what has never been seen before
हृषितःहृषित (√हृष्+क्त, १.१) rejoiced
अस्मिअस्मि (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) I am
दृष्ट्वादृष्ट्वा (√दृश्+क्त्वा) having seen
भयेनभय (३.१) with fear
and
प्रव्यथितम्प्रव्यथित (प्र√व्यथ्+क्त, १.१) is greatly distressed
मनःमनस् (१.१) my mind
मेअस्मद् (६.१) my
तत्तद् (२.१) that
एवएव same
मेअस्मद् (४.१) to me
दर्शयदर्शय (√दृश् +णिच् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) show
देवदेव (८.१) O Lord
रूपम्रूप (२.१) form
प्रसीदप्रसीद (प्र√सद् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) be gracious
देवेशदेवईश (८.१) O Lord of gods
जगन्निवासजगत्निवास (८.१) O refuge of the universe
छन्दः उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
दृ ष्ट पू र्वं हृ षि तो ऽस्मि दृ ष्ट्वा
ये प्र व्य थि तं नो मे
दे मे र्श दे रू पं
प्र सी दे वे न्नि वा
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