Loading data... On slow networks this could take a few minutes.
100%

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥

अन्वयः AI गाण्डीवम् हस्तात् स्रंसते, त्वक् च एव परिदह्यते। अवस्थातुम् न च शक्नोमि, मे मनः भ्रमति इव च।
Summary AI 'The Gandiva bow is slipping from my hand, and my skin is burning all over. I am unable to stand steady, and my mind seems to be reeling.'
सारांश AI हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है, त्वचा जल रही है, मेरा मन भ्रमित हो रहा है और मैं खड़ा रहने में भी असमर्थ हूँ।
पदच्छेदः AI
गाण्डीवम्गाण्डीव (१.१) The Gandiva bow
स्रंसतेस्रंसते (√स्रंस् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) slips
हस्तात्हस्त (५.१) from my hand
त्वक्त्वच् (१.१) skin
and
एवएव also
परिदह्यतेपरिदह्यते (परि√दह् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) is burning all over
not
and
शक्नोमिशक्नोमि (√शक् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) I am able
अवस्थातुम्अवस्थातुम् (अव√स्था+तुमुन्) to stand
भ्रमतिभ्रमति (√भ्रम् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) is reeling
इवइव as it were
and
मेअस्मद् (६.१) my
मनःमनस् (१.१) mind
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
गा ण्डी वं स्रं ते स्ता
त्त्व क्चै रि ह्य ते
क्नो म्य स्था तुं
भ्र ती मे नः
About

Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.