इति गन्तुमिच्छुमभिधाय पुरः
क्षणदृष्टिपातविकसद्वदनाम् ।
स्वकरावलम्बनविमुक्तगल-
त्कलकाञञ्चि काञ्चिदरुणत्तरुणः ॥
इति गन्तुमिच्छुमभिधाय पुरः
क्षणदृष्टिपातविकसद्वदनाम् ।
स्वकरावलम्बनविमुक्तगल-
त्कलकाञञ्चि काञ्चिदरुणत्तरुणः ॥
क्षणदृष्टिपातविकसद्वदनाम् ।
स्वकरावलम्बनविमुक्तगल-
त्कलकाञञ्चि काञ्चिदरुणत्तरुणः ॥
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ति | ग | न्तु | मि | च्छु | म | भि | धा | य | पु | रः | |
| क्ष | ण | दृ | ष्टि | पा | त | वि | क | स | द्व | द | नाम् | |
| स्व | क | रा | व | ल | म्ब | न | वि | मु | क्त | ग | ल | |
| त्क | ल | का | ञ | ञ्चि | का | ञ्चि | द | रु | ण | त्त | रु | णः |
| स | ज | स | स | |||||||||
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