मल्लिनाथः
परीति ॥ प्रमदा अधिवेश्म निजवेश्मनि पत्युरुपचारविधौ प्रत्युत्थानादिकर्मणि अलघोर्महत ऊरुभरात् परिमन्थराभिरलसाभिः अनुपदं पदे पदे स्खलिताभिरपि गतिभिः प्रणयातिभूमि प्रेमप्रकर्षमगमन् । परप्रेमास्पदीभूता इत्यर्थः । प्रत्युत्थानादपि स्खलितगमनमेव पत्युः प्रीतिकरमभूदिति भावः । स्त्रीणां स्खलनं पत्युः प्रीतिकरमिति विरोधाभासोऽलंकारः
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पि | म | न्ध | रा | भि | र | ल | घू | रु | भ | रा | |
| द | धि | वे | श्म | प | त्यु | रु | प | चा | र | वि | धौ |
| स्ख | लि | ता | भि | र | प्य | नु | प | दं | प्र | म | दाः |
| प्र | ण | या | ति | भू | मि | म | ग | म | न्ग | ति | भिः |
| स | ज | स | स | ||||||||
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