उदितोरुसादमतिवेपथुम-
त्सुदृशोऽभिभर्तृ विधुरं त्रपया ।
वपुरादरातिशयशंसि पुनः
प्रतिपत्तिमूढमपि वाढमभूत् ॥
उदितोरुसादमतिवेपथुम-
त्सुदृशोऽभिभर्तृ विधुरं त्रपया ।
वपुरादरातिशयशंसि पुनः
प्रतिपत्तिमूढमपि वाढमभूत् ॥
त्सुदृशोऽभिभर्तृ विधुरं त्रपया ।
वपुरादरातिशयशंसि पुनः
प्रतिपत्तिमूढमपि वाढमभूत् ॥
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | दि | तो | रु | सा | द | म | ति | वे | प | थु | म |
| त्सु | दृ | शो | ऽभि | भ | र्तृ | वि | धु | रं | त्र | प | या |
| व | पु | रा | द | रा | ति | श | य | शं | सि | पु | नः |
| प्र | ति | प | त्ति | मू | ढ | म | पि | वा | ढ | म | भूत् |
| स | ज | स | स | ||||||||
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