मधुरान्नतभ्रू ललितं च दृशोः
सकरप्रयोगचतुरं च वचः ।
प्रकृति स्थमेव निपुणागमितं
स्फुचनृत्तलीलमभवत्सुतनोः ॥
मधुरान्नतभ्रू ललितं च दृशोः
सकरप्रयोगचतुरं च वचः ।
प्रकृति स्थमेव निपुणागमितं
स्फुचनृत्तलीलमभवत्सुतनोः ॥
सकरप्रयोगचतुरं च वचः ।
प्रकृति स्थमेव निपुणागमितं
स्फुचनृत्तलीलमभवत्सुतनोः ॥
मल्लिनाथः
मधुरेति ॥ मधुरं मनोहरं यथा तथोन्नते उच्चलिते ध्रुवौ यस्मिंस्तन्मधुरोन्नतभ्रु । `गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य` (१|२।४८) इति ह्रस्वत्वम् । १दृशोर्ललितं नयनचेष्टा&#३२; च सकरप्रयोग हस्ताभिनयसहितं तच्चतुरं च तद्वचश्च सुतनोः स्त्रियाः प्रकृतिस्थमेव स्वभावसिद्धमेव सदपि निपुणेन निपुणाचार्येणागमितमभ्यासितम् । अत एव स्फुटं प्रथितं यन्नृत्यं तस्य लीलेव लीला यस्य तत्तथोक्तमभवदिति निदर्शनालंकारः । तया नर्तक्युपमा गम्यते
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | धु | रा | न्न | त | भ्रू | ल | लि | तं | च | दृ | शोः |
| स | क | र | प्र | यो | ग | च | तु | रं | च | व | चः |
| प्र | कृ | ति | स्थ | मे | व | नि | पु | णा | ग | मि | तं |
| स्फु | च | नृ | त्त | ली | ल | म | भ | व | त्सु | त | नोः |
| स | ज | स | स | ||||||||
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