मल्लिनाथः
पिदधानमिति ॥ नववधूर्नवोढा अन्वक्पश्चादुपगम्य दृशौ पिदधानं छादयन्तं प्रियं दृष्टिच्छादकः कः वद इति ब्रुवते पृच्छते जनाय गिरा वाचा अभिधातुं नाध्यवससौ नोत्सेहे । लज्जयेति भावः । अध्यवपूर्वात् स्यतेः कर्तरि लिट् । किंतु पुलकैय॑गदत् । अत्र प्रियज्ञानस्यार्थस्य लज्जया असंलक्षितस्य पुलकैः प्रकाशनात् सूक्ष्मालंकारः । `असंलक्षितसूक्ष्मार्थप्रकाशः सूक्ष्म उच्यते` इति लक्षणात्
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पि | द | धा | न | म | न्व | गु | प | ग | म्य | दृ | शौ |
| ब्रु | व | ते | ज | ना | य | व | द | को | ऽय | मि | ति |
| अ | भि | धा | तु | म | ध्य | व | स | सौ | न | गि | रा |
| पु | ल | कैः | प्रि | यं | न | व | व | धू | न्य | ग | दत् |
| स | ज | स | स | ||||||||
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