मल्लिनाथः
उपनेतुमिति ॥ सहसोपगतो हठादागतः कश्चन युवा अत एव रभसेनोत्थितामत एवोन्नतिमता कुचयोर्युगेन करणेन दिवमाकाशमुपनेतुमिवोर्ध्वमुत्क्षेप्सुमिवेति फलोत्प्रेक्षा उत्थाननिमित्तौन्नत्यगुणनिमित्ता । तरसा बलेनाकलितां व्याक्षिप्तां वधू प्रियां परिरभ्याश्लिष्यारुधत् रुद्धवानुपवेशितवान् । ऊर्ध्वोत्क्षेपान्निवारितवानिति चार्थः । रुधेर्लङि `इरितो वा` (अष्टाध्यायी ३.१.५७ ) इति विकल्पात् च्लेरङादेशः । एषा हृष्टा रोमाञ्चिताद्यनुभाववती च
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | प | ने | तु | मु | न्न | ति | म | ते | व | दि | वं |
| कु | च | यो | र्यु | गे | न | त | र | सा | क | लि | तां |
| र | भ | सो | त्थि | ता | मु | प | ग | तः | स | ह | सा |
| प | रि | र | भ्य | क | ञ्च | न | व | धू | म | रु | धत् |
| स | ज | स | स | ||||||||
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