निपपात सम्भ्रमभृतः श्रवणा-
दसितभ्रुवः प्रणदितासिकुलम् ।
दयितावलोकविकसन्नयन-
प्रसरप्रणुन्नमिव वारिरुहम् ॥
निपपात सम्भ्रमभृतः श्रवणा-
दसितभ्रुवः प्रणदितासिकुलम् ।
दयितावलोकविकसन्नयन-
प्रसरप्रणुन्नमिव वारिरुहम् ॥
दसितभ्रुवः प्रणदितासिकुलम् ।
दयितावलोकविकसन्नयन-
प्रसरप्रणुन्नमिव वारिरुहम् ॥
मल्लिनाथः
निपपातेति ॥ संभ्रमभृतः प्रत्युत्थानसंभ्रमिण्याः असितभ्रुवोऽङ्गनायाः प्रण दितालिकुलं गुञ्जदलिपुञ्जम् । `उपसर्गादसमासेऽपि णोपदेशस्य` (८|४|१४) इति णत्वम् । वारिरहं श्रवणोत्पलं दयितावलोकेन विकसतो विस्तारं गच्छतो नयनस्य प्रसरेण प्रसारेण प्रणुन्नमिव । पूर्ववण्णत्वम् । निपपात । तथा संभ्रान्तमित्यर्थः । अत्र संभ्रमहेतुकस्य कर्णोत्पलपातस्य नयनप्रसारहेतुकत्वमुत्प्रेक्ष्यते । एषा च हृष्टा
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | प | पा | त | स | म्भ्र | म | भृ | तः | श्र | व | णा |
| द | सि | त | भ्रु | वः | प्र | ण | दि | ता | सि | कु | लम् |
| द | यि | ता | व | लो | क | वि | क | स | न्न | य | न |
| प्र | स | र | प्र | णु | न्न | मि | व | वा | रि | रु | हम् |
| स | ज | स | स | ||||||||
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