विषतां निषेवितमप-
क्रियया समुपैति सर्वमिति सत्यमदः ।
अमृतुतस्रुऽपि विरहा-
द्भवतो यदमूं दहन्ति हिमरश्मिरुचः ॥
विषतां निषेवितमप-
क्रियया समुपैति सर्वमिति सत्यमदः ।
अमृतुतस्रुऽपि विरहा-
द्भवतो यदमूं दहन्ति हिमरश्मिरुचः ॥
क्रियया समुपैति सर्वमिति सत्यमदः ।
अमृतुतस्रुऽपि विरहा-
द्भवतो यदमूं दहन्ति हिमरश्मिरुचः ॥
मल्लिनाथः
विषतामिति ॥ अपक्रियया विपरीतप्रयोगेण निषेवितमुपयुक्तं सर्वम् ।&#३२; अमृतमपीति भावः । विषतां विषवदहितत्वं समुपैति इत्यद इदं विषत्वं सत्यं ध्रुवम् । यद्यस्मादमृतस्रुतोऽपि । स्रवतेः क्विपि तुक् । हिमरश्मिरुचश्चन्द्रपादाः भवतो विरहाद्धेतोस्त्वया विना सेवनादित्यर्थः । अमूं त्वत्प्रियां दहन्ति । याः पूर्वं त्वया सह सेवनादाह्लादयन्निति भावः । एतेन विषयद्वेषरूपाऽरत्यवस्थोक्ता । अत्र विशेषेण सामान्यसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासः
छन्दः
आर्यागीतिः []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | ष | तां | नि | षे | वि | त | म | प | ||||||
| क्रि | य | या | स | मु | पै | ति | स | र्व | मि | ति | स | त्य | म | दः |
| अ | मृ | तु | त | स्रु | ऽपि | वि | र | हा | ||||||
| द्भ | व | तो | य | द | मूं | द | ह | न्ति | हि | म | र | श्मि | रु | चः |
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