कुसुमादपि स्मितदृशः सुतरां
सुकुमारमङ्गमिति नापरथा ।
अनिशं निजैरकरुणः करुणं
कुसुमेषुरुत्तपाति यद्विशिखैः ॥
कुसुमादपि स्मितदृशः सुतरां
सुकुमारमङ्गमिति नापरथा ।
अनिशं निजैरकरुणः करुणं
कुसुमेषुरुत्तपाति यद्विशिखैः ॥
सुकुमारमङ्गमिति नापरथा ।
अनिशं निजैरकरुणः करुणं
कुसुमेषुरुत्तपाति यद्विशिखैः ॥
मल्लिनाथः
कुसुमादिति ॥ सितदृशः स्मेराक्ष्या अङ्गं कुसुमादपि सुतरां सुकुमारं कोमलमितीदमपरथा अन्यथा न । किंतु सत्यमेवेत्यर्थः । यद्यस्मात् कुसुमेषुरकरुणो निष्कृपः सन् निजैर्विशिखैर्बाणैः । `पृषत्कबाणविशिखाः` इत्यमरः । कुसुमैरेवेत्यर्थः । करुणं दीनं यथा तथा अनिशं नित्यमुत्तपति । तापयतीत्यर्थः । तपतिरयं भौवादिकः सकर्मकः । कुसुमाधिकसौकुमार्याभावे कुसुमैः पीड्यत इति कुसुमाधिकसौकुमार्यगुणोत्प्रेक्षा नापरथेति व्यञ्जकप्रयोगाद्वाच्या
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कु | सु | मा | द | पि | स्मि | त | दृ | शः | सु | त | रां |
| सु | कु | मा | र | म | ङ्ग | मि | ति | ना | प | र | था |
| अ | नि | शं | नि | जै | र | क | रु | णः | क | रु | णं |
| कु | सु | मे | षु | रु | त्त | पा | ति | य | द्वि | शि | खैः |
| स | ज | स | स | ||||||||
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