मल्लिनाथः
दधतीति ॥ रतिपतेरिषवः शिततां नैशित्यं दधति । स्फुटमित्युत्प्रेक्षायाम् । यद्यस्मान्निरन्तरं नीरन्ध्रं बृहत्कठिनं च यत् स्तनमण्डलं तदेवावरणं वर्म यस्य तत्तदपि उत्पलपलाशदृश उत्पलदलाक्ष्याः हृदयमभिदन् भिन्दन्ति स्म । भिदेलङि `इरितो वा` (३।१|५७) इति च्लेरङादेशः । सावरणमपि भिन्नमिति विरोधोत्थापितेयं सरशरनैशित्योत्प्रेक्षा । तया च रन्ध्रान्वेषिणा कामेन निपीड्यमानाया. स्तस्यास्त्वद्विरहो जीवितसंशयमापादयतीति वस्तु द्योत्यते
छन्दः
आर्यागीतिः []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द | ध | ति | स्फु | टं | र | त्प | ते | ||||||||
| रि | ष | वः | शि | त | तां | य | दु | त्प | ल | प | ला | श | दृ | शः | |
| हृ | द | यं | नि | र | न्त | र | बृ | ह | |||||||
| त्क | ठि | न | स्त | न | म | ण | ड | ला | व | र | ण | म | प्य | भि | दन् |
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