मल्लिनाथः
उपेति ॥ अलघुरन्तःसंतापोपाधिक उष्णिमा उष्णत्वं येषां तैः श्वसितैर्नि:श्वासैरुपताप्यमानं सितेतरसरोजदृशो नीलोत्पलाक्ष्या अधरं नवनागवल्लिदलानां ताम्बूलदलानां रागरसो रञ्जनद्रवो द्रवतामार्द्रतां नेतुं न क्षमते न शक्नोति । एतेन ज्वरावस्थोक्ता । अत्र द्रवत्वसंबन्धेऽप्यसंबन्धोक्तेरतिशयोक्तिः
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | प | त | प्य | मा | न | म | ल | घू | ष्णि | भिः | |
| श्व | सि | तैः | सि | ते | त | र | स | रो | ज | दृ | शः |
| द्र | व | तां | न | ने | तु | म | ध | रं | क्ष | म | ते |
| न | व | ना | ग | व | ल्लि | द | ल | रा | ग | र | सः |
| स | ज | स | स | ||||||||
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