मल्लिनाथः
तवेति ॥ सा त्वत्प्रिया तव कथासु गुणकीर्तनेषु मुहुरङ्गुलिमुखेनाङ्गुल्यग्रेण श्रवणं श्रोत्रविवरं परिघट्टयति स्फालयतीति यत् । यदृच्छयेति शेषः । तेन परिघट्टनेन भवद्गुणपूगपूरितं श्रवणं अतृप्ततया तावद्गुणग्रहणेनासंतुष्टतया घनतां नयति । बहुतण्डुलमानार्थं प्रस्थादिवद्भूयो गुणप्रवेशाय श्लेषयतीत्यर्थः । ध्रुवमित्युत्प्रेक्षायाम् । अत्र कण्डूविनोदनार्थं श्रोत्रघट्टने घनतानयनमुत्प्रेक्ष्यते
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | व | सा | क | था | सु | प | रि | घ | ट्ट | य | ति |
| श्र | व | णं | य | द | ङ्गु | लि | मु | खे | न | मु | हुः |
| घ | न | तां | ध्रु | वं | न | य | ति | ते | न | भ | व |
| द्गु | ण | पू | ग | पू | रि | त | म | तृ | प्त | त | या |
| स | ज | स | स | ||||||||
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