मम रूपकीर्तिमहरद्भुवि
यस्तदनु प्रविष्टहृदयेयमिति ।
त्वयि मत्सरादिव निरस्तदयः
सुतरां क्षिणोति खलु तां मदनः ॥
मम रूपकीर्तिमहरद्भुवि
यस्तदनु प्रविष्टहृदयेयमिति ।
त्वयि मत्सरादिव निरस्तदयः
सुतरां क्षिणोति खलु तां मदनः ॥
यस्तदनु प्रविष्टहृदयेयमिति ।
त्वयि मत्सरादिव निरस्तदयः
सुतरां क्षिणोति खलु तां मदनः ॥
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | म | रू | प | की | र्ति | म | ह | र | द्भु | वि | य |
| स्त | द | नु | प्र | वि | ष्ट | हृ | द | ये | य | मि | ति |
| त्व | यि | म | त्स | रा | दि | व | नि | र | स्त | द | यः |
| सु | त | रां | क्षि | णो | ति | ख | लु | तां | म | द | नः |
| स | ज | स | स | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.