ब्रुवते स्म दूत्य उपसृत्य नरा-
न्तरवत्प्रगल्भमतिगर्भगिरः ।
सुहृदर्थमीहितमजिह्मधियां
प्रकृतेर्विराजति विरुद्धमपि ॥
ब्रुवते स्म दूत्य उपसृत्य नरा-
न्तरवत्प्रगल्भमतिगर्भगिरः ।
सुहृदर्थमीहितमजिह्मधियां
प्रकृतेर्विराजति विरुद्धमपि ॥
न्तरवत्प्रगल्भमतिगर्भगिरः ।
सुहृदर्थमीहितमजिह्मधियां
प्रकृतेर्विराजति विरुद्धमपि ॥
मल्लिनाथः
ब्रुवत इति ॥ प्रगल्भा सृष्टाः मतिगर्भाः प्रतिभासाराश्च गिरो यासां ता दूत्यो नरान् पुरुषानुपसृत्य नरवत् नरैः पुंभिस्तुल्यम् । `तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः` (५।१|११५) इति वतिप्रत्ययः । ब्रुवते स्म । न चैतावता वैजात्यं दूषणमित्यर्थान्तरन्यासेनाह-सुहृदर्थमिति । तथा हि—अजिह्मधियामकुटिलबुद्धीनां संबन्धि सुहृदे सुहृदर्थम् । `अर्थेन सह नित्यसमासः सर्वलिङ्गता चेति वक्तव्यम्` (वा०)। ईहितं चेष्टितं प्रकृतेविरुद्धमपि स्वभावविपरीतमपि विराजति शोभते । तस्मान्न धार्ष्ट्ये दोष इत्यर्थः
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ब्रु | व | ते | स्म | दू | त्य | उ | प | सृ | त्य | न | रा |
| न्त | र | व | त्प्र | ग | ल्भ | म | ति | ग | र्भ | गि | रः |
| सु | हृ | द | र्थ | मी | हि | त | म | जि | ह्म | धि | यां |
| प्र | कृ | ते | र्वि | रा | ज | ति | वि | रु | द्ध | म | पि |
| स | ज | स | स | ||||||||
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