ननु सन्दिशेति सुदृशोदितया
त्रपया न किञ्चन किलाभिदधे ।
निजमैक्षि मन्दमनिशं निशितैः
क्रशितं शरीरमशीरशरैः ॥
ननु सन्दिशेति सुदृशोदितया
त्रपया न किञ्चन किलाभिदधे ।
निजमैक्षि मन्दमनिशं निशितैः
क्रशितं शरीरमशीरशरैः ॥
त्रपया न किञ्चन किलाभिदधे ।
निजमैक्षि मन्दमनिशं निशितैः
क्रशितं शरीरमशीरशरैः ॥
मल्लिनाथः
नन्विति ॥ ननु संदिश संदेशं ब्रूहि इत्युदितया दूत्या कथितया सुदृशया नायिकया का त्रपया हेतुना किंचन नाभिदधे किल नाभिहितं खलु । किंतु निशितैरशरीरशरैरनङ्गबाणैरनिशं क्रशितं कृशीकृतम् । कृशशब्दात् `तत्करोति` (ग०) इति ण्यन्तात्कर्मणि क्तः । णाविष्टवद्भावे `र ऋतो हलादेर्लघोः` (अष्टाध्यायी ६.४.१६१ ) इत्युकारस्य रेफादेशः । निजं शरीरं मन्दमैक्षि ईक्षितम् । एषापि कलहान्तरिता मध्यमा च । त्रपया निजहृदयानभिधानान्निजशरीरनिरीक्षणेन स्वावस्थानिवेदनाच्च तुल्यलज्जास्मरत्वावगमादिति । इयं च पञ्चमी कार्याख्या कामावस्था । `दृङ्मनःसङ्गसंकल्पाज्जागरः कृशताऽरतिः। ह्रीत्यागोन्मादमूर्छान्ता इत्यनङ्गदशा दश ॥` इति
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | नु | स | न्दि | शे | ति | सु | दृ | शो | दि | त | या |
| त्र | प | या | न | कि | ञ्च | न | कि | ला | भि | द | धे |
| नि | ज | मै | क्षि | म | न्द | म | नि | शं | नि | शि | तैः |
| क्र | शि | तं | श | री | र | म | शी | र | श | रैः | |
| स | ज | स | स | ||||||||
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