मल्लिनाथः
प्रतिकूलतामिति ॥ विधौ दैवे प्रतिकूलतामुपगते सति बहुसाधनता अनेकसाधनवत्ता विफलत्वमेति । महत्यपि साधनसंपत्तिर्निष्फलैवेत्यर्थः । तथा हि—पतिष्यत आसन्नपातस्य दिनभर्तुः करा अंशवो हस्ताश्च । `बलिहस्तांशवः कराः` इत्यमरः । तेषां सहस्रमपि अवलम्बनायावष्टम्भनाय नाभूत् । अतो दैवमेव प्रबलमिति भावः । विशेषेण सामान्यसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासः
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | ति | कू | ल | मु | प | ग | ते | हि | वि | धौ | |
| वि | फ | ल | त्व | मे | ति | ब | हु | सा | ध | न | ता |
| अ | व | ल | म्ब | ना | य | दि | न | भ | र्तु | र | भू |
| न्न | प | ति | ष्य | तः | क | र | स | ह | स्र | म | पि |
| स | ज | स | स | ||||||||
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