मल्लिनाथः
प्रणयेति ॥ अथ प्रसाधनानन्तरं मुग्धतरोऽत्यन्तकाममोहितस्तरुणीजनः प्रणयप्रकाशनविदः । अनुरागव्यञ्जनचतुरा इत्यर्थः । मधुरा मधुरभाषिणीः, अन्यत्र रम्याकृतीः सुतरामभीष्टजनस्य चित्तहृतो मनोहारिणीः सखी: दृश इव कान्तमनु प्रेयोजनं प्रति प्रजिघाय प्रेषितवान् । हिनोतेर्लिट् । इवेन सह समासवचनाद्दृश इवेत्युपमासमासः । तया सखीनामासत्त्यन्तरङ्गत्वकार्यदर्शित्वादिव्यञ्जनादलंकारेण वस्तुध्वनिः
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | ण | य | प्र | का | श | न | वि | दो | म | धु | राः |
| सु | त | रा | म | भी | ष्ट | ज | न | चि | त्त | हृ | तः |
| प्र | जि | घा | य | का | न्त | म | नु | मु | ग्ध | त | र |
| स्त | रु | णी | ज | नो | दृ | श | इ | वा | थ | स | खीः |
| स | ज | स | स | ||||||||
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