न च मेऽवगच्छति यथा लघुतां
करुणां यथा च कुरुते स मयि ।
निपुणं तथैनमुपगम्य वदे-
रभिदूति काचिदिति संदिदिशे ॥
न च मेऽवगच्छति यथा लघुतां
करुणां यथा च कुरुते स मयि ।
निपुणं तथैनमुपगम्य वदे-
रभिदूति काचिदिति संदिदिशे ॥
करुणां यथा च कुरुते स मयि ।
निपुणं तथैनमुपगम्य वदे-
रभिदूति काचिदिति संदिदिशे ॥
मल्लिनाथः
न चेति ॥ स मे दयितो यथा मयि करुणां कुरुते यथा लघुतामल्पतां च नावगच्छति न मन्यते । एनं दयितमुपगम्य प्राप्य तथा तेन प्रकारेण निपुणं वदेः । विध्यर्थे प्रार्थने वा लिङ् । इतीत्थं काचिन्नायिका अभिदूति दूतीमभि । `लक्षणेनाभिप्रती-` (अष्टाध्यायी २.१.१४ ) इत्यव्ययीभावे नपुंसकह्रस्वत्वम् । संदिदिशे संदिष्टवती । कर्तरि लिट् । स्वरितेत्त्वादात्मनेपदम् । नायिका तु कलहान्तरिता । कोपात्कान्तं पराणुद्य पश्चात्तापसमन्विता` इति लक्षणात्
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | च | मे | ऽव | ग | च्छ | ति | य | था | ल | घु | तां |
| क | रु | णां | य | था | च | कु | रु | ते | स | म | यि |
| नि | पु | णं | त | थै | न | मु | प | ग | म्य | व | दे |
| र | भि | दू | ति | का | चि | दि | ति | सं | दि | दि | शे |
| स | ज | स | स | ||||||||
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