मल्लिनाथः
ध्रुवमिति ॥ मदनेषवः कामशराः महति कठिने कुचतटे प्रतिहतिं प्रतिघातमागताः प्राप्ता ध्रुवम् । यद्यस्माद्गरिम्णा निजभारेण ग्लपितं कार्शतमवलग्नं मध्यं येन तदिदं कुचतटमितराङ्गेन तुल्यमितराङ्गवत् । `तेन तुल्यम्-` (अष्टाध्यायी ५.१.११५ ) इति वतिप्रत्ययः । तनुतां कार्यं नागमन्नाभजत् । `पुषादि` (३।१|५५)सूत्रेण च्लेरङादेशः । तदा मदनेषुपातात् कुचातिरिक्तमङ्गनानामङ्गं कृशमासीदित्यर्थः
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ध्रु | व | मा | ग | ताः | प्र | ति | ह | तिं | क | ठि | ने |
| म | द | ने | ष | वः | कु | च | त | टे | म | ह | ति |
| इ | त | रा | ङ्ग | व | न्न | य | दि | दं | ग | रि | म |
| ग्ल | पि | ता | व | ल | ग्न | म | ग | म | त्त | नु | तां |
| स | ज | स | स | ||||||||
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