मल्लिनाथः
उपगूढेति ॥ रजनीकरश्चन्द्रः अलघुभिरूर्मिभिरेव भुजैरुपगूढा वेला येन तम् । सावष्टम्भमिति भावः । सरितामधीशं समुद्रमपि । स्वभावादक्षोभ्यमपीति भावः । अचुक्षुभत् क्षोभयति स्म । क्षुभ्यतेर्ण्य॑न्ताल्लुङ् `णौ चड्युपधाया हस्वः` (७|४|१) । अनङ्गेन लघु गतसारं यदव एव रागिणस्तेषां गणमचुक्षुभदित्यदः किमिव चित्रम् । न किंचिदित्यर्थः । अत्राक्षोभ्यमब्धिं क्षोभयतश्चन्द्रस्य दण्डापूपिकन्यायादन्यक्षोभकत्वोक्तेरापत्त्तिरलंकारः
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | प | गू | ढ | वे | ल | म | ल | घू | र्मि | भु | जैः |
| स | रि | ता | म | चु | क्षु | प | द | धी | श | म | पि |
| र | ज | नी | क | रः | कि | मि | व | चि | त्र | म | दो |
| य | दु | रा | गि | णां | ग | ण | म | न | ङ्ग | ल | घुम् |
| स | ज | स | स | ||||||||
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