अमलात्मसु प्रतिफलन्नभित-
स्तरुणीकपोलफलकेषु मुहुः ।
विससार सान्द्रतरमिन्दुरुचा-
मधिकावभासितदिशां निकरः ॥
अमलात्मसु प्रतिफलन्नभित-
स्तरुणीकपोलफलकेषु मुहुः ।
विससार सान्द्रतरमिन्दुरुचा-
मधिकावभासितदिशां निकरः ॥
स्तरुणीकपोलफलकेषु मुहुः ।
विससार सान्द्रतरमिन्दुरुचा-
मधिकावभासितदिशां निकरः ॥
मल्लिनाथः
अमलेति ॥ अधिकमवभासिताः प्रकाशिता दिशो याभिस्तासामिन्दुरुचां&#३२; निकरोऽमलात्मसु निर्मलमूर्तिषु तरुणीनां ये कपोलाः फलकानीव तेष्वभितो मुहुः प्रतिफलन् संक्रामन् सान्द्रतरं प्रचुरतरं विससार । दर्पणसंक्रमणादिवेति भावः । अत्रेन्दुरुचां कपोलासंक्रमेऽपि संक्रमोक्तेरसंबन्धे संबन्धोक्तिरूपातिशयोक्तिः
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | म | ला | त्म | सु | प्र | ति | फ | ल | न्न | भि | त |
| स्त | रु | णी | क | पो | ल | फ | ल | के | षु | मु | हुः |
| वि | स | सा | र | सा | न्द्र | त | र | मि | न्दु | रु | चा |
| म | धि | का | व | भा | सि | त | दि | शां | नि | क | रः |
| स | ज | स | स | ||||||||
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