मल्लिनाथः
उदमज्जीति ॥ अपनिद्रपाण्डुरसरोजरुचा विकसितसितपुण्डरीकश्रिया तुहिनद्युतिना चन्द्रेण प्रथमं हरेः पूर्वमेव प्रबुद्धायाः । अन्यथा तन्मुखं न दृश्यतेति भावः । नदराजसुतायाः सिन्धुकन्यायाः श्रियो वदनेन्दुनेवेत्युत्प्रेक्षा । कैटभजितो हरेः शयनात् । समुद्रादित्यर्थः । उक्तोत्प्रेक्षासंभावनार्थमित्थं निर्देशः । उदमजि उन्मग्नम् । उत्थितमित्यर्थः
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | द | म | ज्जि | कै | ट | भ | जि | तः | श | य | ना |
| द | प | नि | द्र | पा | ण्डु | र | स | रो | ज | रु | चा |
| प्र | थ | म | प्र | बु | द्ध | न | द | रा | ज | सु | ता |
| व | द | ने | न्दु | ने | व | तु | हि | न | द्यु | ति | ना |
| स | ज | स | स | ||||||||
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