मल्लिनाथः
प्रथममिति ॥ हिमदीधितिश्चन्द्रः प्रथमं कला कलामात्रमभवत् । `कला तु षोडशो भागः` इत्यमरः । अथार्धमात्रमभवत् । अथो अनन्तरम् । `अथो अथ` इत्यमरः । उदितः साकल्यादुत्थितः सन् अमहान्महान्संपद्यमानोऽभून्महदभूत् । अभूततद्भावे च्विः । हलन्तत्वान्न कार्यान्तरप्राप्तिः । तथा हि—द्युतिशालिनस्तेजिष्ठा अपि क्रमशः क्रमेणैवोपचयं वृद्धिं दधति, सहसा झटिति तु न दधति ध्रुवम् । सामान्येन विशेषसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासः
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | थ | मं | क | ला | भ | व | द | था | र्ध | म | थो |
| हि | म | दी | धि | ति | र्म | ह | द | भू | दु | दि | तः |
| द | ध | ति | ध्रु | वं | क्र | म | श | ए | व | न | तु |
| द्यु | ति | शा | लि | नो | ऽपि | स | ह | सो | प | च | यम् |
| स | ज | स | स | ||||||||
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