मल्लिनाथः
कलयेति ॥ पुरः प्राच्यामग्रभागे च तुषारकिरणस्येन्दोः कलया किरणेन अन्यत्रोपलक्षितं परिमन्दमल्पं भिन्ना विदलितास्तिमिरौघा एव जटा यस्य तत् गगनं न मृषा सत्यम् । गणाधिपतेः प्रमथपतेरीश्वरस्य । `गणाः प्रमथसंख्यौघाः` इति वैजयन्ती । मूर्तिरिति जनैः क्षणमभ्यपद्यत । `गगनमष्टानां शिवमूर्तीनामन्यतममिति यत्तत्सत्यम्, अभिपन्नमित्यर्थः । कलामात्रोदितश्चन्द्र इति फलितोऽर्थः । रूपकालंकारः
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | ल | या | तु | षा | र | कि | र | ण | स्य | पु | रः |
| प | रि | म | न्द | भि | न्न | ति | मि | रौ | घ | ज | टम् |
| क्ष | ण | म | भ्य | प | द्य | त | ज | नै | र्न | मृ | षा |
| ग | ग | नं | ग | णा | दि | प | ति | मू | र्ति | रि | ति |
| स | ज | स | स | ||||||||
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