ददृशेऽपि भास्कररुचाह्नि न यः
स तमीं तमोबिरभिगम्य तताम् ।
द्युतिमग्रहीद्ग्रहगणो लघवः
प्रकटीभवन्ति मलिनाश्रयतः ॥
ददृशेऽपि भास्कररुचाह्नि न यः
स तमीं तमोबिरभिगम्य तताम् ।
द्युतिमग्रहीद्ग्रहगणो लघवः
प्रकटीभवन्ति मलिनाश्रयतः ॥
स तमीं तमोबिरभिगम्य तताम् ।
द्युतिमग्रहीद्ग्रहगणो लघवः
प्रकटीभवन्ति मलिनाश्रयतः ॥
मल्लिनाथः
ददृश इति ॥ यो ग्रहगणोऽहनि सवितुस्त्विषा न ददृशे नेक्षितः स ग्रहगणस्तमोभिस्ततां व्याप्तां ताम्यन्त्यस्यामिति तमीं रात्रिम् । `रजनी यामिनी तमी` इत्यमरः । अभिगम्य प्राप्य द्युतिमग्रहीत् । ग्रहेर्लुङि `ग्रहोऽलिटि-` (अष्टाध्यायी ७.२.३७ ) इति इटो दीर्घत्वेऽपि स्थानिवत्त्वेनेट्त्वात्सिचो लोपे सवर्णदीर्घः । तथा हिलघवोऽल्पाः । `त्रिविष्टेऽल्पे लघुः` इत्यमरः । मलिनाश्रयतो निकृष्टाश्रयणात् प्रकटीभवन्ति । अर्थान्तरन्यासः
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द | दृ | शे | ऽपि | भा | स्क | र | रु | चा | ह्नि | न | यः |
| स | त | मीं | त | मो | बि | र | भि | ग | म्य | त | ताम् |
| द्यु | ति | म | ग्र | ही | द्ग्र | ह | ग | णो | ल | घ | वः |
| प्र | क | टी | भ | व | न्ति | म | लि | ना | श्र | य | तः |
| स | ज | स | स | ||||||||
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