अथ सान्द्रसान्ध्यकिरणारुणितं
हरिहेतिहूति मिथुनं पततोः ।
पृथगुत्पपात विरहार्तिदल-
द्धृदयस्रुतासृगनुलिप्तमिव ॥
अथ सान्द्रसान्ध्यकिरणारुणितं
हरिहेतिहूति मिथुनं पततोः ।
पृथगुत्पपात विरहार्तिदल-
द्धृदयस्रुतासृगनुलिप्तमिव ॥
हरिहेतिहूति मिथुनं पततोः ।
पृथगुत्पपात विरहार्तिदल-
द्धृदयस्रुतासृगनुलिप्तमिव ॥
मल्लिनाथः
अथेति ॥ अथ संध्योदयानन्तरं सान्द्रा ये सांध्याः संध्यायां भवाः । `संधिवेलाद्यतुनक्षत्रेभ्योऽण्` (अष्टाध्यायी ४.३.१६ ) इत्यण्प्रत्ययः । तैः किरणैररुणितमरुणीकृतमत एव विरहात् र्या. विरहवेदनया दलतो दीर्यमाणाद्धृदयात् स्रुतेन क्षरितेनासृजा रुधिरेणानुलिप्तमिव स्थितमित्युत्प्रेक्षा । हरेर्विष्णोर्हेतिरायुधम् । चक्रमित्यर्थः । `हेतिः शस्त्रे तु नृस्त्रियोः` इति केशवः । हरिहेतेर्हूतिरिव हूतिराह्वा यस्य तद्धरिहेतिहूति । चक्राह्वमित्यर्थः । पततोः पत्रिणोः । `पतत्रिपत्रिपतगपतत्पत्ररथाण्डजाः` इत्यमरः । मिथुनम् । चक्रवाकद्वन्द्वमित्यर्थः । पृथक् भेदेनोत्पपात उदडीयत
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | थ | सा | न्द्र | सा | न्ध्य | कि | र | णा | रु | णि | तं |
| ह | रि | हे | ति | हू | ति | मि | थु | नं | प | त | तोः |
| पृ | थ | गु | त्प | पा | त | वि | र | हा | र्ति | द | ल |
| द्धृ | द | य | स्रु | ता | सृ | ग | नु | लि | प्त | मि | व |
| स | ज | स | स | ||||||||
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