रुचिधाम्नि भर्तरि भृशं विमलाः
परलोकमभ्युपगते विवशुः ।
ज्वलनं त्विषः कथमितरथा
सुलभोऽन्यजन्मनि स एव पतिः ॥
रुचिधाम्नि भर्तरि भृशं विमलाः
परलोकमभ्युपगते विवशुः ।
ज्वलनं त्विषः कथमितरथा
सुलभोऽन्यजन्मनि स एव पतिः ॥
परलोकमभ्युपगते विवशुः ।
ज्वलनं त्विषः कथमितरथा
सुलभोऽन्यजन्मनि स एव पतिः ॥
मल्लिनाथः
रुचीति ॥ रुचिधाम्नि तेजोनिधौ सूर्ये भर्तरि पत्यौ परलोकं देशान्तरमभ्युपगते, मृते च सति विमलाः शुद्धास्त्विषो ज्वलनं विविशुः । `अग्निं वावादित्यः सायं प्रविशति` इति श्रुतेरिति भावः । अन्यत्र `मृते या म्रियते पत्यौ सा स्त्री ज्ञेया पतिव्रता` इति स्मरणादिति भावः । अग्निप्रवेशफलमाह-इतरथा ज्वलनप्रवेशे अन्यजन्मनि जन्मान्तरे स एव स सूर्य एव पतिः, अन्यत्र तु योऽस्मिञ्जन्मनि पतिः स एव कथं सुलभः । न कथंचिदित्यर्थः । `उद्यन्तं वावादित्यमग्निरनुसमारोहति` इति श्रुतेः । तेनैव सह मोदत इति स्मरणादिति भावः । अतोऽग्निप्रवेशो युक्त इति समर्थनाद्वाक्यार्थहेतुकं काव्यलिङ्गमलंकारः
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रु | चि | धा | म्नि | भ | र्त | रि | भृ | शं | वि | म | लाः |
| प | र | लो | क | म | भ्यु | प | ग | ते | वि | व | शुः |
| ज्व | ल | नं | त्वि | षः | क | थ | मि | त | र | था | |
| सु | ल | भो | ऽन्य | ज | न्म | नि | स | ए | व | प | तिः |
| स | ज | स | स | ||||||||
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