स्वं रागादुपरि वितन्वतोत्तरीयं
कान्तेन प्रतिवारितातपायाः ।
सच्छत्रादपरविलासिनीसमूह-
च्छायासीदधिकतरा तदापरस्याः ॥
स्वं रागादुपरि वितन्वतोत्तरीयं
कान्तेन प्रतिवारितातपायाः ।
सच्छत्रादपरविलासिनीसमूह-
च्छायासीदधिकतरा तदापरस्याः ॥
कान्तेन प्रतिवारितातपायाः ।
सच्छत्रादपरविलासिनीसमूह-
च्छायासीदधिकतरा तदापरस्याः ॥
मल्लिनाथः
स्वमिति ॥ रागाद्धेतोरुपरि प्रियाया मूर्धनि स्वं स्वकीयमुत्तरीयं वितन्वता विस्तारयता कान्तेन प्रियेण प्रतिपदं पदे पदे वारित आतपो यस्यास्तस्या अपरस्याः कस्याश्चिदङ्गनायाः सच्छत्रात् छत्रयुक्तादपरविलासिनीसमूहात् सकाशात् । `पञ्चमी विभक्ते` (अष्टाध्यायी २.३.४२ ) इति पञ्चमी । अधिकतरा छाया अनातपः कान्तिश्च तदा आसीत् । छत्रच्छायातोऽपि कान्तस्वहस्तधृतोत्तरीयच्छायैवानन्यसाधारणी ज्यायसी । मुखकान्तिरपि तस्या एव भूयसीति भावः । `छाया त्वनातपे कान्तौ` इत्यमरः । एतेन सच्छत्रादच्छत्रस्याधिकच्छायेति विरोधोऽपि निरस्त इति विरोधाभासोऽलंकारः
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्वं | रा | गा | दु | प | रि | वि | त | न्व | तो | त्त | री | यं |
| का | न्ते | न | प्र | ति | वा | रि | ता | त | पा | याः | ||
| स | च्छ | त्रा | द | प | र | वि | ला | सि | नी | स | मू | ह |
| च्छा | या | सी | द | धि | क | त | रा | त | दा | प | र | स्याः |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
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